करूँ मजूरी शब्द की, ले कर कलम कुदाल
मन प्रस्तर को खोदकर, रचूँ भाव दीवाल
रचूँ भाव दीवाल, बुर्ज वाक्यों के काढ़ूँ
धरुँ ईंट पर ईंट, भवन हर रोज सँवारूँ
अलंकार, रस, छंद, घोल धर चित्त सबूरी
चुरा समय की फांक, कलम से करूँ मजूरी
वंदना बाजपेयी
कुंडली छंद
बिखरे जो कागजों पर कुछ दर्द ज़िंदगी के किस्से घरों से निकले हैं सर्द बंदगी के बनते हैं शब्द यूं ही आँसू के मोतियों से उड़ते फिर जहां में हमदर्द पायँदगी के वंदना बाजपेयी
मुक्तक

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